केंद्रीय मत्स्य सचिव ने मुनस्यारी कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर का किया दौरा, ट्राउट पालकों से संवाद

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पिथौरागढ़, भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने जनपद पिथौरागढ़ के मुनस्यारी स्थित कोल्डवॉटर फिशरीज क्लस्टर का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने ट्राउट मत्स्य पालकों से सीधा संवाद किया और क्लस्टर के विकास कार्यों की प्रगति जानी।

सचिव डॉ. लिखी ने जोहार मत्स्य स्वायत्त सहकारिता और नामजाला ट्राउट फार्म का भ्रमण किया। उन्होंने स्थानीय सहकारी समितियों द्वारा रेनबो ट्राउट पालन को एक टिकाऊ आजीविका विकल्प के रूप में अपनाने की सराहना की। सचिव ने कहा कि गोरी गंगा की हिमनदीय जलधाराओं और अनुकूल जल तापमान के कारण मुनस्यारी रेनबो ट्राउट उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। इससे पारंपरिक निर्वाह कृषि को अर्ध-व्यावसायिक उद्यम में बदलने में मदद मिली है। ट्राउट मत्स्य पालकों ने भी अपने अनुभव साझा किए और क्षेत्र में ट्राउट पालन से संबंधित जानकारी दी।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत पिथौरागढ़ को शीतजल मत्स्य क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है। इस पहल का उद्देश्य मत्स्य सहकारी समितियों को सशक्त बनाना, आजीविका के अवसर बढ़ाना और हिमालयी क्षेत्र में सतत मत्स्य विकास को प्रोत्साहित करना है। यह दौरा उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों में ट्राउट पालन को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

उत्तराखंड सरकार वर्तमान में नेपाल को ट्राउट मछली का निर्यात कर रही है। इसके अतिरिक्त, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) को भी समझौते के तहत ट्राउट की आपूर्ति की जा रही है।

सचिव डॉ. लिखी ने बताया कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शीतजल मत्स्य पालन आजीविका विविधीकरण, पोषण सुरक्षा और निर्यात की दृष्टि से रणनीतिक महत्व रखता है। उन्होंने कहा कि पीएमएमएसवाई के अंतर्गत भारत सरकार ने शीतजल क्षेत्रों में 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। इस निवेश से रेसवे, हैचरी, फीड मिल, कोल्ड स्टोरेज और फसलोपरांत प्रबंधन जैसी आधारभूत संरचनाओं के विकास को समर्थन मिल रहा है।

देश में शीतजल मत्स्य पालन मुख्य रूप से इन्हीं छह पर्वतीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्रित है। इन क्षेत्रों की हिमनदीय नदियां, उच्च हिमालयी झीलें और स्वच्छ जलधाराएं रेनबो ट्राउट जैसी उच्च मूल्य वाली शीतजल मत्स्य प्रजातियों के पालन के लिए आदर्श स्थितियां प्रदान करती हैं। पीएमएमएसवाई के तहत इन क्षेत्रों में 5,600 से अधिक रेसवे, 54 हैचरी, 293 कोल्ड स्टोरेज और 260 फीड मिल स्वीकृत किए गए हैं। पिछले एक दशक में ट्राउट उत्पादन में छह गुना वृद्धि हुई है, जो लगभग 5,000 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष तक पहुंच गया है।

उत्तराखंड में मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए 317 करोड़ रुपये की परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनमें आधुनिक मत्स्य बाजार, लैंडिंग सेंटर और सितारगंज में एकीकृत एक्वापार्क की स्थापना शामिल है। राज्य सरकार ने 170 करोड़ रुपये की ट्राउट प्रोत्साहन योजना भी शुरू की है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2028-29 तक 1,500 रेसवे, 100 मिनी हैचरी और 600 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित करना है।

सचिव ने मुनस्यारी क्षेत्र में रेनबो ट्राउट पालन की शुरुआत और मत्स्य पालकों को वैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध कराने में केंद्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय (आईसीएआर-डीसीएफआर), भीमताल की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने मत्स्य बीज उत्पादन, रोग प्रबंधन और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में निदेशालय के कार्यों को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने जून में नेपाल को उत्तराखंड से ट्राउट के प्रथम निर्यात को एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, जिससे राज्य के मत्स्य उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए रास्ते खुले हैं।

दौरे के दौरान सीमांत गांवों में ट्राउट पालन के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर भी चर्चा हुई। ट्राउट पालन से स्थानीय लोगों को आजीविका के नए अवसर मिले हैं। इससे ईको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ आईटीबीपी जैसे संस्थागत खरीदारों के माध्यम से बाजार की उपलब्धता भी सुनिश्चित हुई है।

डॉ. लिखी ने कहा कि शीतजल मत्स्य पालन किसानों की आय बढ़ाने, ईको-टूरिज्म को प्रोत्साहित करने, महाशीर जैसी संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और सीमांत गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने इसे हिमालयी क्षेत्रों में सतत आजीविका, स्थानीय आर्थिक विकास और मत्स्य क्षेत्र में उद्यमिता को बढ़ावा देने का एक प्रभावी माध्यम बताया।