
नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतों में तेजी ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। बाजार में चीनी का भाव पहली बार 60 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर को पार करता दिखाई दे रहा है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब चीनी उत्पादन में कमी और उपलब्ध स्टॉक में गिरावट की खबरें बाजार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। दूसरी ओर, गन्ने से एथेनॉल तैयार करने की बढ़ती मांग ने भी चीनी उद्योग के सामने उपलब्ध संसाधनों के संतुलन का सवाल खड़ा कर दिया है।
चीनी भले ही हर परिवार के कुल मासिक खर्च में बहुत बड़ा हिस्सा न हो, लेकिन इसका इस्तेमाल रोजाना की चाय-कॉफी से लेकर मिठाई, बेकरी और कई खाद्य पदार्थों में होता है। इसलिए चीनी के दाम में तेज वृद्धि का असर केवल किराना खरीदारी तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव उन वस्तुओं की लागत पर भी पड़ सकता है, जिनमें चीनी प्रमुख कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होती है।
बाजार में 60 रुपये से ऊपर पहुंचा भाव
बाजार से सामने आए आंकड़ों के अनुसार जयपुर की प्रमुख मंडी में चीनी का भाव करीब 60.60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया। कीमतों में यह तेजी उपभोक्ताओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से चीनी को अपेक्षाकृत स्थिर कीमत वाली रोजमर्रा की वस्तु माना जाता रहा है।
थोक बाजार में कीमत बढ़ने के बाद इसका असर खुदरा बाजार में दिखाई देने में कुछ समय लग सकता है। परिवहन, कारोबारियों का मार्जिन और स्थानीय बाजार की स्थिति के आधार पर अलग-अलग शहरों में उपभोक्ता को मिलने वाली कीमत अलग हो सकती है। इसलिए 60 रुपये से अधिक का थोक भाव हर जगह खुदरा कीमत के बिल्कुल समान होने का संकेत नहीं है, लेकिन यह बाजार में बढ़ते दबाव को जरूर दर्शाता है।
एथेनॉल की मांग ने बदली तस्वीर
चीनी बाजार में मौजूदा बदलाव को समझने के लिए एथेनॉल की भूमिका भी अहम है। देश में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। इसके लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में किया जाता है।
चीनी मिलों के लिए एथेनॉल एक अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। गन्ने से बनने वाले उत्पादों का उपयोग केवल चीनी तैयार करने में नहीं होता, बल्कि उनका एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में भी लगाया जा सकता है। इससे मिलों को अपने उत्पादन का बेहतर आर्थिक उपयोग करने का विकल्प मिलता है।
हालांकि चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे केवल एथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उत्पादन कितना हुआ, शुरुआती स्टॉक कितना था, घरेलू खपत कितनी रही और बाजार में नई आपूर्ति किस गति से पहुंची—इन सभी बातों का कीमतों पर असर पड़ता है।
उत्पादन घटने से बढ़ा दबाव
इस सीजन में चीनी उत्पादन कम रहने का अनुमान बाजार की चिंता को बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मौजूदा सीजन में देश का चीनी उत्पादन लगभग 26.9 मिलियन टन रहने का अनुमान जताया गया है। यह पिछले सीजन की तुलना में करीब 20 से 25 प्रतिशत कम बताया गया है।
उत्पादन में कमी का सीधा मतलब है कि बाजार में उपलब्ध नई चीनी की मात्रा कम हो सकती है। यदि उसी दौरान घरेलू खपत बनी रहती है या बढ़ जाती है तो उपलब्ध स्टॉक पर अतिरिक्त दबाव बनना स्वाभाविक है।
चीनी उद्योग में उत्पादन का अनुमान मौसम, गन्ने की उपलब्धता और मिलों की पेराई सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए अंतिम आंकड़ों में बदलाव की संभावना भी रहती है। फिर भी उत्पादन में अनुमानित कमी ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है।
स्टॉक में बड़ी गिरावट
चीनी की कीमतों को लेकर सबसे बड़ी चिंता उपलब्ध स्टॉक से जुड़ी हुई है। सामने आए आंकड़ों में देश की चीनी मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक लगभग 61 लाख टन बताया गया है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 126.38 लाख टन था।
स्टॉक में यह अंतर बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। पर्याप्त स्टॉक बाजार को अचानक बढ़ी मांग या उत्पादन में कमी से निपटने में मदद करता है। लेकिन जब भंडार कम होता है तो मांग और आपूर्ति के बीच थोड़ा सा अंतर भी कीमतों को तेजी से प्रभावित कर सकता है।
यही वजह है कि चीनी उद्योग और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए आने वाले महीनों में स्टॉक की स्थिति महत्वपूर्ण रहने वाली है।
त्योहारों के मौसम में बढ़ सकती है मांग
भारत में त्योहारों के दौरान चीनी की खपत सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। मिठाई की दुकानों, हलवाई कारोबार और घरों में बनने वाले पारंपरिक पकवानों में चीनी का इस्तेमाल बढ़ता है। इसके अलावा बेकरी और खाद्य उत्पाद बनाने वाले कारोबार में भी इसकी मांग बनी रहती है।
यदि त्योहारों से पहले बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध नहीं हुई तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है। इसका असर मिठाई कारोबार पर पड़ने की संभावना है। कारोबारी बढ़ी हुई लागत को अपने उत्पादों की कीमत में शामिल कर सकते हैं। ऐसे में त्योहारों पर मिठाई खरीदने वाले ग्राहकों को पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
आम आदमी के बजट पर कितना असर?
चीनी की कीमत में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू खरीदारी पर दिखाई देगा। हालांकि रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीनी की मात्रा सीमित होती है, लेकिन इसके साथ चाय, मिठाई और दूसरे खाद्य उत्पाद महंगे होने पर परिवार के कुल खर्च में अप्रत्यक्ष वृद्धि हो सकती है।
छोटे कारोबारियों के लिए इसका प्रभाव और अधिक हो सकता है। चाय की दुकान, मिठाई की दुकान, बेकरी और छोटे खाद्य कारोबार में चीनी नियमित रूप से इस्तेमाल होती है। लागत बढ़ने पर उन्हें कीमत बढ़ाने और ग्राहकों को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा।
आगे बाजार की दिशा किन बातों पर निर्भर?
चीनी की कीमत आगे किस दिशा में जाएगी, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। सबसे महत्वपूर्ण होगा कि उत्पादन अनुमान के मुताबिक कितना रहता है, बाजार में कितना स्टॉक उपलब्ध है और एथेनॉल के लिए गन्ने से जुड़े उत्पादों का कितना इस्तेमाल होता है।
इसके अलावा सरकार की नीतियां, चीनी मिलों की आपूर्ति और घरेलू मांग भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है। यदि नई आपूर्ति बेहतर होती है और बाजार में स्टॉक बढ़ता है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। वहीं उत्पादन और उपलब्धता कमजोर रहने पर तेजी कुछ समय तक जारी रह सकती है।
फिलहाल 60 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंची चीनी की कीमत ने रसोई के बजट को लेकर नई चिंता जरूर पैदा कर दी है। आने वाले महीनों में इसका असर केवल चीनी की खरीद तक सीमित रहता है या मिठाई और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों तक पहुंचता है, यह बाजार में आपूर्ति और मांग के संतुलन पर निर्भर करेगा।